...चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये
गज़ल सम्राट दुष्यंत त्यागी को नमन
बिजनौर। गज़ल सम्राट का नाम आते ही एक ऐसे महान व्यक्ति दुष्यंत त्यागी की याद आ जाती है, जिसने हिन्दी जगत में अनेक रचनाओं से एक दूसरे के दर्द को महसूस कर उसे शब्दो में पिरो कर कविताओं का रूप दिया है। दुष्यंत कुमार त्यागी का जन्म 1 सितंबर 1932 को नजीबाबाद अंतर्गत मंडावली क्षेत्र के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था। इन्हें बचपन से ही कविताएं लिखना, गजल लिखना व उन्हें बयां करने का शौक था। आगे चलकर वह भोपाल में एजुकेशन डायरेक्टर के पद पर रहे। उनकी मृत्यु भोपाल में 30 दिसंबर 1975 को हुई थी। प्रत्येक साल 1 सितंबर को उनकी गजलें व कविताएं पढ़कर उन्हें याद किया जाता है। हिंदी गजल के प्रणेता महान गजलकार दुष्यंत कुमार त्यागी आज भी प्रासंगिक हैं। दुष्यंत कुमार के बाल सखा राजपुर नवादा के निकट गांव रघुनाथपुर निवासी सत्य कुमार त्यागी बताते हैं कि दुष्यंत एक नेक दिल इंसान थे। उनकी नजर में कोई बड़ा या छोटा नहीं था। वह हमेशा सबको समान देते व प्यार करते थे। दुष्यंत अक्सर दशहरा से पहले गांव आते थे और गांव की रामलीला में लक्ष्मण का रोल करते थे। दुष्यंत अक्सर गंगा स्नान के मेले में जाते थे। उस समय में भी उनके पास ट्रैक्टर आदि की सुविधा थी मगर वह हमेशा बैलगाड़ी से ही मेले में जाते थे। वर्ष 1971 के गंगा स्नान की स्मृति को याद करते हुए सत्य कुमार त्यागी बताते हैं कि उस वर्ष बहुत अधिक आंधी तूफान व ओला गिरने से मेला अस्त व्यस्त हो गया था। दुष्यंत ने घर आकर अपनी एक गजल में उसका वर्णन भी किया था।
उनकी एक प्रसिद्ध गज़ल-
हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए।
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी।
शर्त थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं।
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।।
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